भारत का रोज़गार संकट: कारण और समाधान
परिचय
भारत एक गंभीर और लंबे समय से चले आ रहे रोज़गार संकट का सामना कर रहा है, जहाँ लाखों शिक्षित युवा औपचारिक अर्थव्यवस्था में उपयुक्त नौकरियाँ पाने में असमर्थ हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के अनुसार, 2022 में भारत की बेरोज़गारी दर 7-8% के उच्च स्तर पर बनी रही, जो वैश्विक औसत से अधिक है।
भारत में रोज़गार का परिदृश्य
भारत में रोज़गार मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बँटा हुआ है:
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वेतन आधारित रोज़गार: इसमें निजी और सरकारी क्षेत्रों में मिलने वाली नियमित (formal) नौकरियाँ और निर्माण तथा कृषि जैसे क्षेत्रों में प्रचलित दिहाड़ी (casual) मजदूरी शामिल है।
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स्वरोज़गार: इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हैं, जैसे किसान, छोटे दुकानदार, उद्यमी और गिग इकोनॉमी में काम करने वाले फ्रीलांसर।
बेरोज़गारी के प्रमुख कारण
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गतिहीन रोज़गार वृद्धि: पिछले दशकों में गैर-कृषि क्षेत्र में औपचारिक नौकरियों की वृद्धि दर लगभग स्थिर रही है।
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प्रच्छन्न बेरोज़गारी: बड़ी संख्या में लोग स्वरोज़गार या अनौपचारिक कार्यों में लगे हैं, जो उपयुक्त नौकरियों की कमी को दर्शाता है।
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कमजोर श्रम मांग: उत्पादन में धीमी वृद्धि और श्रम-बचत टेक्नोलॉजी (स्वचालन) के कारण कंपनियाँ कम लोगों को काम पर रख रही हैं।
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‘रोज़गारहीन विकास’ (Jobless Growth): यह भारत की सबसे बड़ी चुनौती है। इसका मतलब है कि जब देश की जीडीपी बढ़ती है, तो कंपनियाँ टेक्नोलॉजी और बेहतर प्रक्रियाओं के कारण अधिक उत्पादक हो जाती हैं। परिणामस्वरूप, उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्हें उतने नए कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं पड़ती, जितनी पहले पड़ती थी। भारत में यह समस्या अन्य विकासशील देशों की तुलना में अधिक गंभीर है।
संकट से निपटने के उपाय
सिर्फ जीडीपी वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है:
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राष्ट्रीय रोज़गार नीति (NEP) लागू करना: एक ऐसी नीति बनाना जो सीधे तौर पर रोज़गार सृजन पर केंद्रित हो।
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शहरी मनरेगा: शहरी गरीबों को रोज़गार सुरक्षा प्रदान करने के लिए मनरेगा जैसी योजना शहरों में लागू करना।
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औद्योगीकरण और कृषि में निवेश: अधिक रोज़गार पैदा करने के लिए उद्योगों को बढ़ावा देना और कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाना।
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कृषि का विविधीकरण: किसानों को पारंपरिक खेती के अलावा बागवानी, पशुपालन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे अधिक आय वाले क्षेत्रों की ओर प्रोत्साहित करना।
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शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार: कार्यबल को कुशल बनाने और सामाजिक क्षेत्र में रोज़गार पैदा करने के लिए इन क्षेत्रों में निवेश करना।
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विकास का विकेंद्रीकरण: ग्रामीण क्षेत्रों में अवसर पैदा कर शहरों की ओर पलायन का दबाव कम करना।
निष्कर्ष
भारत में रोज़गार संकट को केवल जीडीपी वृद्धि से हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक ऐसे समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो प्रत्यक्ष रोज़गार सृजन, कौशल विकास, औद्योगीकरण और संरचनात्मक सुधारों पर एक साथ ध्यान केंद्रित करे।









