अपशिष्ट से ऊर्जा: एक विस्तृत अवलोकन
भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के साथ, अपशिष्ट प्रबंधन एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है। इस चुनौती से निपटने और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक स्थायी समाधान के रूप में “अपशिष्ट से ऊर्जा” (Waste-to-Energy) की अवधारणा महत्वपूर्ण हो गई है। यह प्रक्रिया न केवल कचरे की मात्रा को कम करती है, बल्कि ऊर्जा का एक मूल्यवान स्रोत भी प्रदान करती है।
अपशिष्ट का वर्गीकरण
अपशिष्ट को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:
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जैवअपघटनीय (Biodegradable) अपशिष्ट: इस श्रेणी में वे जैविक पदार्थ शामिल हैं जिन्हें सूक्ष्मजीवों द्वारा प्राकृतिक रूप से विघटित किया जा सकता है। इसमें कृषि अवशेष, खाद्य प्रसंस्करण अपशिष्ट, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (जैसे खाद्य अपशिष्ट, बगीचे के अपशिष्ट, कागज, और कपड़े), मुर्गीपालन फार्म, पशुशाला, बूचड़खानों और विभिन्न उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट शामिल हैं।
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अ-जैवअपघटनीय (Non-biodegradable) अपशिष्ट: ये वे सामग्रियां हैं जो जैविक रूप से आसानी से विघटित नहीं होती हैं। इसमें लकड़ी के पौधे, कार्डबोर्ड, कंटेनर, रैपिंग, फेंके गए कपड़े, लकड़ी का फर्नीचर, कृषि शुष्क अपशिष्ट और धान की भूसी जैसी वस्तुएं शामिल हैं।
अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन की तकनीकें
भारत में अपशिष्ट से बिजली और बायोगैस/सिनगैस बनाने के लिए कई प्रौद्योगिकियाँ उपलब्ध हैं:
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बायोमीथेनेशन (Biomethanation): यह एक जैविक प्रक्रिया है जिसमें बैक्टीरिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जैविक पदार्थों को बायोगैस में परिवर्तित करते हैं।इस बायोगैस में मुख्य रूप से मीथेन (लगभग 60%) और कार्बन डाइऑक्साइड (लगभग 40%) होती है। बायोमीथेनेशन का दोहरा लाभ है, क्योंकि यह ऊर्जा के साथ-साथ खाद भी प्रदान करता है। इस प्रक्रिया से उत्पन्न बायोगैस का उपयोग सीधे गर्मी पैदा करने के लिए या बिजली उत्पादन के लिए गैस इंजनों में किया जा सकता है। इसे शुद्ध करके बायो-सीएनजी भी बनाया जा सकता है, जिसका उपयोग वाहनों में ईंधन के रूप में या राष्ट्रीय गैस ग्रिड में किया जा सकता है।
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भस्मीकरण (Incineration): इस तकनीक में अपशिष्ट को पूरी तरह से जलाकर गर्मी पैदा की जाती है, जिसका उपयोग भाप बनाने और फिर वाष्प टरबाइनों के माध्यम से बिजली उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।भस्मीकरण से निकलने वाली फ्लू गैसों को वायु प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों के माध्यम से उपचारित किया जाता है। बची हुई राख का उपयोग भवन निर्माण सामग्री में किया जा सकता है/
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गैसीकरण (Gasification): इस प्रक्रिया में उच्च तापमान (500-1800 डिग्री सेल्सियस) और सीमित ऑक्सीजन की उपस्थिति में अपशिष्ट को सिनगैस (कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण) में परिवर्तित किया जाता है। इस सिनगैस का उपयोग तापीय या बिजली उत्पादन के लिए किया जा सकता है।
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ताप-अपघटन (Pyrolysis): यह ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अपशिष्ट को गर्म करके दहनशील गैसों, तरल (बायो-ऑयल) और ठोस अवशेषों (कार्बन ब्लैक) में विघटित करने की प्रक्रिया है।इस प्रक्रिया से उत्पन्न गैस का उपयोग गर्मी या बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है।
भारत में अपशिष्ट से ऊर्जा की क्षमता और वर्तमान स्थिति
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, भारत में शहरी और औद्योगिक जैविक अपशिष्ट से लगभग 5690 मेगावाट ऊर्जा उत्पादन की क्षमता है।[1] 30 जून, 2019 तक, नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (MSW), शहरी और औद्योगिक अपशिष्ट पर आधारित ग्रिड से जुड़ी बिजली परियोजनाओं की संचयी उपलब्धि 138.30 मेगावाट तक पहुंच गई है। इसके अतिरिक्त, ऑफ-ग्रिड बिजली उत्पादन 111.43 मेगावाट, बायोगैस उत्पादन क्षमता 6,65,606 घन मीटर प्रतिदिन और बायो-सीएनजी उत्पादन क्षमता 59,028 किलोग्राम प्रतिदिन तक पहुंच गई है।
देश भर में, कई राज्यों ने अपशिष्ट से ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली में चार वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट हैं जो लगभग 76 मेगावाट बिजली का उत्पादन करते हैं।महाराष्ट्र के पिंपरी-चिंचवड़ में एक वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट है जो प्रतिदिन 700 टन सूखे कचरे का उपयोग करके 14 मेगावाट बिजली का उत्पादन करता है। केरल सरकार ने भी हाल ही में कोझीकोड में राज्य की पहली अपशिष्ट-से-ऊर्जा परियोजना की घोषणा की है, जिससे लगभग 6 मेगावाट बिजली का उत्पादन होने की उम्मीद है।
स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत, सरकार ने अपशिष्ट से ऊर्जा और अपशिष्ट से बायोगैस परियोजनाओं को मंजूरी दी है ताकि चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जा सके।इन पहलों का उद्देश्य अपशिष्ट के वैज्ञानिक प्रबंधन को प्राप्त करना और पुराने डंपसाइटों का सुधार करना है।
हालांकि, इन परियोजनाओं के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं, जैसे अपशिष्ट का उचित पृथक्करण, उच्च नमी की मात्रा और कचरे का कम कैलोरी मान, जो बिजली उत्पादन की दक्षता को प्रभावित कर सकता है।[इन चुनौतियों से निपटने और अपशिष्ट से ऊर्जा की पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।









