जलवायु – एक विस्तृत विवेचन
यह पाठ पृथ्वी के उद्भव से लेकर आज तक होने वाले निरंतर परिवर्तनों, विशेषकर जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित है। जलवायु को मानव जीवन और पर्यावरण पर सर्वाधिक प्रभावशाली तत्व माना गया है, जो आर्थिक विकास को भी नियंत्रित करता है।
मुख्य बिंदु:
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जलवायु की परिभाषा और महत्व:
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जलवायु किसी स्थान के मौसम (वायुदाब, तापमान, आर्द्रता, वर्षा, सौर प्रकाश) का दीर्घकालीन (30 वर्ष या अधिक) औसत है।
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यह भौगोलिक स्थिति (अक्षांश, ऊँचाई), सौर प्रकाश, हवाएँ, महासागरीय धाराएँ आदि कारकों से नियंत्रित होती है।
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पृथ्वी पर जीवन, वनस्पति, जीव-जंतु और मानव गतिविधियाँ जलवायु पर निर्भर हैं। फसलें भी विशिष्ट जलवायु दशाओं पर निर्भर करती हैं।
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जलवायु और मौसम में अंतर:
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मौसम: वायुमंडल की क्षणिक, अल्पकालिक दशाओं (जैसे आज का सुहावना या खराब मौसम) को दर्शाता है। यह क्षण-प्रतिक्षण बदलता है।
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जलवायु: किसी स्थान या प्रदेश के मौसम का दीर्घकालिक औसत है। इसे बदलने में हजारों-लाखों वर्ष लगते हैं।
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जलवायु की विशेषताएँ:
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दीर्घकालीन औसत मौसम की परिचायक।
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इसमें दीर्घकालीन वायुमंडलीय विक्षोभ व परिवर्तन भी शामिल।
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विस्तृत प्रदेश का प्रतिनिधित्व करती है।
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ऊर्जा एवं पदार्थों के दीर्घकालीन विनिमय का आभास कराती है।
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स्थायी वायुमंडलीय विशेषताओं का प्रतिनिधित्व।
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जलवायु परिवर्तन:
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प्राचीन काल में प्रकृति संतुलित थी, लेकिन मानवीय विकास और संसाधनों के अत्यधिक उपभोग से प्रदूषण (जल, वायु, भूमि, औद्योगिक, विकिरण) बढ़ा, जिसने जलवायु को बदल दिया है।
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विश्वस्तरीय जलवायु परिवर्तन आज एक वैश्विक चिंता है, जो शहरीकरण से और गहरा रहा है।
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प्रभाव: तटीय शहरों में बाढ़ का खतरा, तापमान वृद्धि, ग्लेशियर पिघलना, समुद्री जलस्तर में वृद्धि, अतिवृष्टि, सूखा, तूफान।
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वैश्विक तापन (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन (Climate Change):
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वैश्विक तापन: वायुमंडल में CO2 जैसी गैसों की वृद्धि से सूर्य की विकिरणों का अवशोषण बढ़ना, जिससे औसत तापमान में वृद्धि।
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जलवायु परिवर्तन: वैश्विक तापन के कारण मौसम में असाधारण बदलाव (अतिवृष्टि, सूखा, बाढ़ आदि)।
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जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक:
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अक्षांश: विषुवत रेखा से दूरी (निकट = गर्म, दूर = ठंडा)।
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समुद्र तल से ऊँचाई: ऊँचाई बढ़ने पर तापमान घटता है (पाठ में 100 मीटर पर 6°C कमी का उल्लेख, जो मानक से भिन्न है)।
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पर्वतों की दिशा: हवाओं के मार्ग को प्रभावित कर तापमान व वर्षा पर असर (जैसे हिमालय का प्रभाव)।
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समुद्री प्रभाव: निकटता से सम जलवायु, दूरी से विषम। सागरीय धाराएँ भी प्रभावी।
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पवनों की दिशा: ठंडे या गर्म स्थानों से आने वाली हवाएँ तापमान बदलती हैं।
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जलवायु का वर्गीकरण (कोपेन):
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तापमान, वर्षा और वनस्पति के आधार पर विश्व को 6 मुख्य जलवायु प्रदेशों में बांटा गया:
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ऊष्ण कटिबन्धीय आर्द्र जलवायु
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शुष्क जलवायु
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सम शीतोष्ण जलवायु
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मध्य अक्षांशों की आर्द्र सूक्ष्म तापीय (शीतोष्ण आर्द्र) जलवायु
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ध्रुवीय जलवायु
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उच्च पर्वतीय जलवायु
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भारत की जलवायु और मानसून:
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मुख्यतः मानसूनी वर्षा से प्रभावित।
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कृषि मानसून पर निर्भर, अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव।
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दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितम्बर) अधिकांश वर्षा लाता है।
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वैश्विक तापन से वायु की आर्द्रता धारण क्षमता बढ़ने से अधिक वर्षा की संभावना।
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निष्कर्ष:
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जलवायु परिवर्तन एक गंभीर समस्या है, जिसके दूरगामी परिणाम हैं।
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मानव का भविष्य पर्यावरण अनुरक्षण पर निर्भर करता है।
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जलवायु प्रदेशों का निर्धारण जटिल है क्योंकि उनमें स्पष्ट सीमा रेखाओं के बजाय संक्रमण क्षेत्र होते हैं।
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यह पाठ जलवायु की मौलिक अवधारणाओं, उसके निर्धारकों, मौसम से उसके अंतर, वर्तमान जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और भारत के संदर्भ में मानसून के महत्व को व्यापक रूप से समझाता है।









