बदलते वैश्विक समीकरण: आत्मनिर्भरता ही भारत का सुरक्षा कवच और विकास मंत्र
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई बड़े उतार-चढ़ाव देखे हैं – चीन का आक्रामक रवैया, अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की आकस्मिक वापसी और हालिया रूस-यूक्रेन युद्ध। इन घटनाओं ने न केवल वैश्विक शक्ति संतुलन को चुनौती दी है, बल्कि भारत जैसी उभरती महाशक्ति के लिए अपनी सुरक्षा और विकास की राह पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया है। ऐसे में, प्रधानमंत्री द्वारा घोषित ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
क्यों जरूरी है आत्मनिर्भरता?
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चीन का सीमा विवाद: हिमालय क्षेत्र में चीन द्वारा यथास्थिति को बदलने की कोशिश और सैन्य जमावड़े ने भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया है।
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अफगानिस्तान संकट: अमेरिका का अफगानिस्तान से रातों-रात हटना और तालिबान का सत्ता में आना इस बात का प्रमाण है कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग क्षणभंगुर हो सकते हैं और राष्ट्रों को अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं पर निर्भर रहना होगा।
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रूस-यूक्रेन युद्ध: इस संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित किया है और भारत को कूटनीतिक रूप से एक कठिन स्थिति में डाल दिया है, जहाँ उसे अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक शांति के बीच संतुलन साधना पड़ रहा है।
इन तीनों घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि एक देश को अप्रत्याशित खतरों और दबावों से अपनी रक्षा करने के लिए आत्मनिर्भर होना कितना आवश्यक है।
आत्मनिर्भर भारत: अवसर और संकल्प
वर्ष 2020 में शुरू किया गया ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि नए भारत का एक स्पष्ट दृष्टिकोण है। 20 लाख करोड़ रुपए के विशेष आर्थिक पैकेज के साथ इस अभियान का लक्ष्य भारत को हर क्षेत्र में स्वतंत्र और सक्षम बनाना है।
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पांच स्तंभ: अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना, प्रणाली, जीवंत जनसांख्यिकी और मांग इसके प्रमुख स्तंभ हैं।
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लक्ष्य: आयात पर निर्भरता कम करना, गुणवत्तापूर्ण स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना और वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना।
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भावना: यह अभियान अलगाववाद का नहीं, बल्कि विश्व कल्याण में सहयोग की भावना का प्रतीक है, ‘लोकल’ उत्पादों को ‘ग्लोबल’ बनाने पर जोर देता है।
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सुधार: कृषि, कर प्रणाली, कानून और वित्तीय प्रणाली में साहसिक सुधार इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
चुनौतियाँ और आगे की राह
आत्मनिर्भरता की राह चुनौतियों से रहित नहीं है। टैरिफ बढ़ाना या आयात पर प्रतिबंध लगाना अल्पकाल में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित कर सकता है। बौद्धिक संपदा, डेटा स्थानीयकरण और कुछ क्षेत्रों जैसे अंतरिक्ष व रक्षा में निजीकरण की प्रक्रियाओं में अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है।
भविष्य की रणनीति:
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दूरदर्शी योजना: क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
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मुक्त व्यापार: भारत को निवेशकों को आकर्षित करने के लिए अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करना चाहिए, न कि केवल टैरिफ का सहारा लेना चाहिए।
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नवाचार पर जोर: विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, गणित (STEM), डिजिटल कौशल और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना होगा।
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डिजिटल शक्ति: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा क्षमताओं का पूर्ण दोहन करना होगा।
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सतत विकास: पर्यावरण संरक्षण और गरीबों का समर्थन करने वाली व्यापार नीतियों को अपनाना होगा।
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मांग में वृद्धि: बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाकर रोजगार सृजन और आर्थिक गति को बढ़ावा देना होगा।
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समग्र सुधार: सिविल सेवाओं, शिक्षा, कौशल विकास और श्रम कानूनों में व्यापक सुधार आवश्यक हैं।
निष्कर्ष
आज के अनिश्चित वैश्विक परिवेश में, आत्मनिर्भरता भारत के लिए एक रणनीतिक अनिवार्यता बन गई है। इसका अर्थ दुनिया से कटना नहीं, बल्कि वैश्विक नेटवर्क में एक मजबूत, विश्वसनीय और सक्षम भागीदार के रूप में उभरना है। इसके लिए सरकार, उद्योग जगत, शिक्षाविदों और सभी नागरिकों को मिलकर एक साझा दृष्टिकोण के साथ काम करने की आवश्यकता है, ताकि भारत न केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके, बल्कि वैश्विक मंच पर एक अग्रणी शक्ति के रूप में अपनी पहचान भी स्थापित कर सके।









