एकाकी व्यापार की परिभाषा
एकाकी व्यापार, व्यवसाय का वह स्वरूप है जिसमें एक ही व्यक्ति व्यवसाय का संगठनकर्ता, स्वामी और प्रबंधक होता है। वह स्वयं ही व्यवसाय के लिए आवश्यक पूंजी लगाता है, उसका संचालन करता है, और व्यापार में होने वाले समस्त लाभ-हानि के लिए अकेले ही उत्तरदायी होता है।
डॉ. जॉन ए. शुबिन के अनुसार: “एकाकी व्यापार के अंतर्गत एक ही व्यक्ति समस्त व्यापार का संगठन करता है, उसका स्वामी होता है तथा अपने नाम से व्यापार का संचालन करता है।”
एकाकी व्यापार के प्रमुख लक्षण या विशेषताएं
एकाकी व्यापार की प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
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एकल स्वामित्व: इस व्यापार का स्वामी केवल एक व्यक्ति होता है और वही व्यापार के सभी कार्यों के लिए जिम्मेदार होता है।
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निर्णय लेने में स्वतंत्रता: व्यापारी अपने व्यवसाय से संबंधित सभी निर्णय स्वयं और शीघ्रता से लेता है। उसे किसी अन्य व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
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असीमित उत्तरदायित्व: व्यापार में हानि होने पर व्यापारी का दायित्व असीमित होता है। यदि व्यापार की संपत्ति हानि की भरपाई के लिए अपर्याप्त है, तो उसे अपनी निजी संपत्ति से उस हानि को पूरा करना पड़ता है।
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सीमित व्यापार क्षेत्र: एक व्यक्ति की पूंजी और प्रबंधन क्षमता सीमित होती है, इसलिए साझेदारी या कंपनी की तुलना में एकाकी व्यापार का कार्यक्षेत्र भी सीमित होता है।
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ऐच्छिक प्रारंभ व समापन: इस व्यापार को शुरू करना और बंद करना बहुत सरल होता है। व्यापारी अपनी इच्छा के अनुसार कभी भी व्यापार शुरू या समाप्त कर सकता है, इसके लिए किसी कानूनी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं होती।
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लाभों पर एकाधिकार: व्यापार में होने वाले संपूर्ण लाभ पर केवल व्यापारी का अधिकार होता है। इसी तरह, हानि की स्थिति में भी वह अकेला ही उत्तरदायी होता है।
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व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता: एकाकी व्यापारी अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार किसी भी व्यवसाय को चुनने और उसे बदलने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र होता है।










