सुरक्षित जलवायु

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यह रिपोर्ट, जो मानवाधिकारों और पर्यावरण पर विशेष प्रतिवेदक द्वारा प्रस्तुत की गई है, जलवायु परिवर्तन सहित सभी पर्यावरणीय मुद्दों पर मानवाधिकारों से संबंधित मानदंडों पर प्रकाश डालती है और एक सुरक्षित, स्वच्छ, स्वस्थ एवं सतत पर्यावरण के लिए आवश्यक तत्वों और दायित्वों को स्पष्ट करती है।

मुख्य बिंदु:

  1. वर्तमान पर्यावरणीय संकट: मानव सभ्यता अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है, जिसमें प्रदूषण, प्रजातियों का विलोपन और जलवायु परिवर्तन प्रमुख हैं। वायु प्रदूषण से लाखों अकाल मृत्यु हो रही हैं, और दस लाख प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं। जलवायु परिवर्तन इन समस्याओं को और गंभीर बना रहा है।

  2. मानवीय गतिविधियों का प्रभाव: होलोसीन युग की स्थिर जलवायु में विकसित मानव समाज ने औद्योगिक क्रांति के बाद जीवाश्म ईंधन के उपयोग, वनोन्मूलन और औद्योगिक कृषि जैसी गतिविधियों से पृथ्वी की जलवायु को अस्थिर कर दिया है। कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 3 मिलियन वर्षों में अपने उच्चतम स्तर पर है, और हम “एंथ्रोपोसिन” नामक नए भूवैज्ञानिक युग में प्रवेश कर चुके हैं।

  3. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव:

    • चरम मौसमी घटनाएँ, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र स्तर में वृद्धि, तूफान, जल लवणीकरण, समुद्र अम्लीकरण, वर्षा में परिवर्तन, बाढ़, सूखा, वनाग्नि, वायु प्रदूषण में वृद्धि, मरुस्थलीकरण, जल संकट, पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश और जैव विविधता का नुकसान हो रहा है।

    • इससे खाद्य असुरक्षा, आजीविका की हानि, गरीबी में वृद्धि (2030 तक 100 मिलियन लोग अत्यधिक गरीबी में जा सकते हैं), और विस्थापन (2050 तक 150 मिलियन से अधिक लोग) जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

    • जैव विविधता के नुकसान में जलवायु परिवर्तन तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारक है।

  4. जलवायु संकट के कारण:

    • मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन और बायोमास का दहन, वनोन्मूलन एवं औद्योगिक कृषि हैं।

    • विद्युत/ऊष्मा उत्पादन (25%), औद्योगिक प्रक्रियाएँ (21%), परिवहन (14%) ग्रीनहाउस गैसों के प्रमुख स्रोत हैं। कृषि, वनोन्मूलन और भूमि उपयोग परिवर्तन से 24% उत्सर्जन होता है।

    • CO2 (76%), मीथेन (16%), नाइट्रस ऑक्साइड (6%) प्रमुख ग्रीनहाउस गैसें हैं।

    • उत्सर्जन में भारी असमानता है: सबसे गरीब 50% आबादी केवल 10% उत्सर्जन करती है, जबकि सबसे अमीर 10% आबादी 50% उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। 100 “कार्बन मेजर” कंपनियाँ 1988 से 71% औद्योगिक उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं।

  5. भविष्य की चुनौतियाँ और कुछ सकारात्मक पहलू:

    • पेरिस समझौते के बावजूद 2018 में ऊर्जा संबंधी CO2 उत्सर्जन तेजी से बढ़ा।

    • सकारात्मक रूप से, अक्षय ऊर्जा (सौर, पवन) की लागत में भारी गिरावट आई है और उनकी क्षमता में अत्यधिक वृद्धि हुई है।

  6. मानवाधिकारों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव:

    • जलवायु परिवर्तन जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, जल एवं स्वच्छता, स्वस्थ वातावरण, आवास, संपत्ति, आत्मनिर्णय, विकास और संस्कृति के अधिकारों के लिए खतरा है।

    • जीवन का अधिकार: पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन जीवन के अधिकार के लिए सबसे बड़े खतरों में से हैं।

    • स्वास्थ्य का अधिकार: श्वसन रोग, हृदय रोग, कुपोषण, जल जनित रोग और मानसिक रोगों में वृद्धि।

    • भोजन का अधिकार: खाद्य उत्पादन और सुरक्षा प्रभावित।

    • जल एवं स्वच्छता का अधिकार: उपलब्धता, पहुँच और गुणवत्ता संकट में।

    • बच्चों के अधिकार: बच्चे विशेष रूप से स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति संवेदनशील होते हैं।

    • स्वच्छ वातावरण का अधिकार: सुरक्षित जलवायु, स्वच्छ वायु-जल, जैव विविधता खतरे में।

    • सुभेद्य जनसंख्या: हाशिये पर मौजूद लोग, महिलाएँ और स्थानीय समुदाय विशेष रूप से संवेदनशील हैं, हालाँकि वे समाधान में योगदान भी दे सकते हैं।

  7. जलवायु परिवर्तन से संबंधित मानवाधिकार प्रतिबद्धताएँ और समस्याएँ:

    • पेरिस समझौते में मानवाधिकारों के सम्मान की प्रतिबद्धता है।

    • लेकिन, वैश्विक उत्सर्जन बढ़ रहा है, जीवाश्म ईंधन को सब्सिडी दी जा रही है, वनोन्मूलन जारी है, और वित्तीय प्रतिबद्धताएँ (जैसे $100 बिलियन प्रति वर्ष) पूरी नहीं हो रही हैं। यह नागरिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

  8. आगे की राह (समाधान):

    • जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना: सब्सिडी समाप्त करना, कोयला/गैस संयंत्रों को चरणबद्ध तरीके से बंद करना या कार्बन कैप्चर तकनीक लगाना, जीवाश्म ईंधन उद्योग के नीति-प्रभाव को सीमित करना।

    • अन्य न्यूनीकरण कार्यवाहियाँ: अक्षय ऊर्जा में भारी निवेश, वनोन्मूलन रोकना और वनीकरण करना (एक ट्रिलियन वृक्ष), एकल उपयोग प्लास्टिक को समाप्त करना, पादप आधारित आहार को बढ़ावा देना, खाद्य अपशिष्ट कम करना।

    • सुभेद्य लोगों की सुरक्षा के लिये अनुकूलन: राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाएँ लागू करना, आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियाँ बनाना, सामाजिक सुरक्षा तंत्र प्रदान करना, प्रकृति-आधारित समाधानों को प्राथमिकता देना।

    • जलवायु वित्त को बढ़ावा देना: विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों के लिए वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करना और बढ़ाना।

    • क्षति एवं नुकसान का वित्तपोषण: नुकसान और क्षति के लिए नए वित्तपोषण तंत्र स्थापित करना।

    • संयुक्त राष्ट्र संस्थानों को सशक्त बनाना: रिपोर्टिंग, व्यवसायों को प्रोत्साहित करना, तकनीकी सहायता प्रदान करना।

  9. निष्कर्ष:
    एक सुरक्षित जलवायु स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार और मानव कल्याण के लिए आवश्यक है। वैश्विक जलवायु आपातकाल से निपटने के लिए मानवाधिकारों का सम्मान करते हुए तत्काल, मजबूत और दूरगामी कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिए राजनीतिक और कॉर्पोरेट नेतृत्व की अत्यंत आवश्यकता है, जैसा कि ग्रेटा थुनबर्ग ने कहा, “मैं चाहती हूँ कि आप इस प्रकार कार्य करें जैसे कि आग हमारे घर में लग गई हो।”

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