खुशखबरी! बंजर भूमि का अभिशाप होगा खत्म: ऊसर सुधार की वैज्ञानिक तकनीक से लौटेगी खेतों में हरियाली!
भारत में लाखों हेक्टेयर भूमि ऊसर या बंजर होने के कारण कृषि योग्य नहीं रह पाती, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। ऊसर भूमि, जिसमें सोडियम जैसे लवणों की अत्यधिक मात्रा होती है, फसलों के लिए ज़हर समान होती है और इसमें उत्पादन लगभग शून्य होता है। लेकिन अब चिंता की बात नहीं! कृषि वैज्ञानिकों ने ऊसर भूमि को सुधारने की एक ऐसी क्रमबद्ध, चरणबद्ध और समयबद्ध तकनीकी विधि विकसित की है, जिससे इन अनुपजाऊ खेतों को फिर से उपजाऊ बनाकर लहलहाती फसलों का सपना साकार किया जा सकता है।
क्यों बन जाती है भूमि ऊसर?
विशेषज्ञों के अनुसार, ऊसर भूमि बनने के कई प्रमुख कारण हैं। इनमें सबसे मुख्य है जल भराव या खेतों से पानी की निकासी की उचित व्यवस्था का न होना। इसके अतिरिक्त, कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अधिक तापमान, भूमिगत जल स्तर का ऊंचा होना, निचले इलाकों में पानी का रिसाव, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, भूमि को लंबे समय तक परती छोड़ना और सबसे महत्वपूर्ण, रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक एवं असंतुलित प्रयोग तथा जैविक खादों (जैसे गोबर, कम्पोस्ट, ढैंचा की हरी खाद) की पूर्ण अनदेखी करना शामिल है। लवणीय जल से सिंचाई भी भूमि को बंजर बनाने में योगदान करती है।
ऊसर सुधार की अचूक वैज्ञानिक विधि:
यह कोई जादू नहीं, बल्कि ठोस वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित एक प्रक्रिया है, जिसके प्रमुख चरण इस प्रकार हैं:
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सर्वेक्षण और योजना: सबसे पहले भूमि का गहन सर्वेक्षण किया जाता है ताकि जल प्रबंधन और निकासी की सटीक योजना बनाई जा सके। बोरिंग के लिए ऊंचे स्थान का चयन किया जाता है, और यह सुनिश्चित किया जाता है कि एक बोरिंग से दूसरे की दूरी कम से कम 200 मीटर हो।
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खेत की तैयारी: बरसात या नम मौसम में खेतों की मजबूत मेड़बन्दी (90 सेमी चौड़ी, 30 सेमी ऊंची) की जाती है। इसके साथ ही सिंचाई और जल निकासी नालियों का निर्माण होता है। भूमि की 2-3 बार गहरी जुताई (14-20 सेमी) करके छोड़ दिया जाता है, और सतह पर जमे लवणों को खुरचकर हटा दिया जाता है।
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समतलीकरण और जल प्रबंधन: खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बांटकर समतल किया जाता है, जिसमें जल निकास नाली की ओर हल्का ढाल दिया जाता है। मिट्टी की जांच कराकर आवश्यक जिप्सम की मात्रा का निर्धारण किया जाता है। सिंचाई नालियों को भूमि की सतह से ऊपर और खेत नालियों को सतह से नीचे बनाया जाता है।
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जिप्सम का प्रयोग और लीचिंग (निक्षालन): यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है। समतल क्यारियों में, नम भूमि पर, निर्धारित मात्रा में जिप्सम को समान रूप से फैलाकर मिट्टी की ऊपरी 7-8 सेमी सतह में मिला दिया जाता है। इसके बाद क्यारियों में 10-15 सेमी पानी भरकर 10 दिनों तक ‘लीचिंग’ के लिए छोड़ दिया जाता है। इस दौरान पानी का स्तर बनाए रखना होता है। लीचिंग से हानिकारक लवण घुलकर पानी के साथ या तो भूमि के नीचे चले जाते हैं या खेत से बाहर निकाल दिए जाते हैं।
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फसल का चुनाव: लीचिंग के बाद, खेत का लवणीय पानी निकालकर अच्छा पानी भरा जाता है और ऊसर रोधी फसल (जैसे धान की विशेष किस्में) की रोपाई की जाती है।
अन्य सहायक मृदा सुधारक:
जिप्सम के अलावा, पायराइट, फास्फोजिप्सम जैसे अकार्बनिक रसायन; और प्रेसमड, ऊसर तोड़ खाद, शीरा, धान का पुआल, गोबर, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट जैसे कार्बनिक पदार्थ भी भूमि सुधार में अत्यंत प्रभावी हैं। साथ ही, ढैंचा, धान, चुकन्दर, पालक, गन्ना और बबूल जैसे पेड़-पौधे भी जैविक सुधार में मदद करते हैं।
यह तकनीक न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक होगी बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी। ऊसर भूमि के अभिशाप से मुक्ति पाकर किसान अब अपनी भूमि से सोना उगा सकेंगे।









